31 January 2007

सूरज का टुकड़ा

वक्त के मछुआरे ने
फेंका था जाल
कैद करने के लिए
सघन तम को
जाल के छिद्रों से
फिसल गया तम
और
कैद हो गया
सूरज का टुकड़ा
वक्त का मछुआरा
कैद किए फिर रहा है
सूरज के उस टुकड़े को
और
सघनतम होती जा रही है
तमराशि, घट घट में
उगानी होगी
नई पौध
सूरज के नए टुकड़ों की
जागृत करनी होगी बोधगम्यता
युग शिक्षक के अन्तस में
तभी खिलेगी वनराशि
महकेगा वातास
छिटकेंगीं ज्ञान रश्मियाँ
मिट जाएँगीं
आप ही आप
आपस की दूरियाँ
तो, आओ !
अभी से .......
इस नए पथ की ओर
कहा भी गया है
जब आँख खुले
तभी होती है भोर !!

-डॉ॰ जगदीश व्योम

1 comment:

मोहिन्दर कुमार said...

Babhut sunder likha hae Dr. Saheb Aap ne, padh ker dil khush ho gaya... Nirasha ko Aasha ke ujaale se nikharati huyee rachna...
Shamaa kijiyega mera Hindi Software kaam nahi ker raha hai.