व्योम का सृजन संसार
http://vyomlekhansandrabh.blogspot.in/
10 April 2023
21 October 2011
Parichay-Photo
डा० जगदीश व्योम
बी-12 ए / 58 ए
धवलगिरि, सेक्टर-34
नोएडा 201301
मोबा. 09868304645
बी-12 ए / 58 ए
धवलगिरि, सेक्टर-34
नोएडा 201301
मोबा. 09868304645
24 April 2011
परिचय
डा० जगदीश व्योम
जन्म - 01 मई 1960 ई०
जन्म स्थान - शम्भूनगला, फर्रुखाबाद (उ०प्र०)
शिक्षा - एम०ए० (हिन्दी साहित्य) ; एम०एड०; पी-एच०डी० ( ‘कन्नौजी लोकगाथाओं का सर्वेक्षण और विश्लेषण’ विषय पर लखनऊ विषय विद्यालय से 1992 में)
प्रकाशन- कविता, कहानी, बालकहानी, शोध लेख, नवगीत, हाइकु, व्यंग्य आदि का पत्र-पत्रिकाओं में तथा इंटरनेट पर अनवरत प्रकाशन।
प्रसारण- दिल्ली दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल से कविताएँ तथा परिचर्चा का प्रसारण, आकाशवाणी के दिल्ली, लखनऊ, सूरतगढ़, मथुरा, ग्वालियर, भोपाल आदि केन्द्रों से हाइकु, कहानी बालकहानी, कविता, वार्ता, ब्रज नवकथा आदि का प्रसारण।
जन्म - 01 मई 1960 ई०
जन्म स्थान - शम्भूनगला, फर्रुखाबाद (उ०प्र०)
शिक्षा - एम०ए० (हिन्दी साहित्य) ; एम०एड०; पी-एच०डी० ( ‘कन्नौजी लोकगाथाओं का सर्वेक्षण और विश्लेषण’ विषय पर लखनऊ विषय विद्यालय से 1992 में)
प्रकाशन- कविता, कहानी, बालकहानी, शोध लेख, नवगीत, हाइकु, व्यंग्य आदि का पत्र-पत्रिकाओं में तथा इंटरनेट पर अनवरत प्रकाशन।
प्रसारण- दिल्ली दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल से कविताएँ तथा परिचर्चा का प्रसारण, आकाशवाणी के दिल्ली, लखनऊ, सूरतगढ़, मथुरा, ग्वालियर, भोपाल आदि केन्द्रों से हाइकु, कहानी बालकहानी, कविता, वार्ता, ब्रज नवकथा आदि का प्रसारण।
कृतियाँ -
लोक साहित्य एवं नवगीत पर विशेष कार्य
कन्नौजी लोकगाथाओं का सर्वेक्षण और विश्लेषण (शोध ग्रंथ)-
लोकोक्ति एवं मुहावरा कोश -संपादक- डा0 जगदीश व्योम, प्रकाशक- आराधना ब्रदर्स, 124/152 सी० गोविन्द नगर, कानपुर-6, प्रथम संस्करण-1994
‘‘मैंने डा० जगदीश व्योम द्वारा लिखित पुस्तक ‘लोकोक्ति एवं मुहावरा कोश’ का अवलोकन किया। यह कार्य श्रमसाध्य है और अत्यंत उपयोगी है।’’
-प्रो० सूर्यप्रसाद दीक्षित, अध्यक्ष हिन्दी एवं भारतीय भाषा विभाग, लखनऊ विश्व विद्यालय। (दिनांक-31-05-95)
नन्हा बलिदानी- बाल उपन्यास, डा० जगदीश व्योम , प्रकाषक- सारंग प्रकाशन, सारंग विहार, बालाजी पुरम, रिफायनरी नगर मथुरा, उ०प्र०, प्रथम संस्करण-जून 1999
डब्बू की डिबिया- बाल उपन्यास, डा० जगदीश व्योम , प्रकाशक- करैया प्रकाषन, 62 जुमेराती, होशंगाबाद, म०प्र०, प्रथम संस्करण-2003
सगुनी का सपना- (बाल कहानी संग्रह),
इन्द्र धनुष- -
भोर के स्वर- (समवेत काव्य संकलन)-संपादक- डा० जगदीश व्योम, प्रकाशक- आराधना ब्रदर्स, 124/152 सी0 गोविन्द नगर, कानपुर-6, प्रथम संस्करण-1990
संपादन -
आजादी के आस पास (कहानी संग्रह)-संपादक- डा० जगदीश व्योम, प्रकाशक- सुन्दर साहित्य सदन, 882, गली बेरी वाली, बाजार सीताराम, दिल्ली-110006, प्रथम संस्करण-2004
कहानियों का कुनबा (कहानी संग्रह) -संपादक- डा० जगदीश व्योम, प्रकाशक- जाहन्वी प्रकाशन, ए-71 विवेक विहार, फेज-2, दिल्ली-95, प्रथम संस्करण-2003
फुलवारी’ (बालगीत संकलन),‘
बाल प्रतिबिम्ब’ (बाल साहित्य पत्रिका)
‘हाइकु दर्पण’- हाइकु कविता की एक मात्र पत्रिका का संपादन
नवगीत २०१३ [नवगीत की पाठशाला से चुनी हुई रचनाओं का संकलन]
कुछ लेख व रचनाएँ-
बाल-साहित्य का केन्द्र लोक-साहित्य -लेख, डा० जगदीश व्योम, कादम्बिनी, मासिक पत्रिका, हिन्दुस्तान टाइम्स लि0, 18-20 कस्तूरबा गांधी मार्ग, नयी दिल्ली-110001, जून 1998, पृष्ठ-80-83
लोकजीवन के जीवंत दस्तावेज -लेख, डा० जगदीश व्योम, कादम्बिनी, मासिक पत्रिका, हिन्दुस्तान टाइम्स लि0, 18-20 कस्तूरबा गांधी मार्ग, नयी दिल्ली-110001, जुलाई 2000, पृष्ठ-120-123
कन्नौजी लोकगाथाओं का आर्थिक पक्ष -लेख, डा० जगदीश व्योम, मड़ई-11, सम्पादक- डा० कालीचरण यादव, बनियापारा, जूनाबिलापुर, बिलासपुर (म0प्र0)-495001, लोकसाहित्य अंक, पृष्ठ-179-182
सिमट गई सूरज के रिश्तेदारों तक ही धूप -कविता, डा० जगदीश व्योम, मधुमती, मासिक पत्रिका, राजस्थान साहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका, अगस्त 1998, पृष्ठ-132
लोकगाथाओं में सांस्कृतिक चेतना -लेख, डा० जगदीश व्योम, पंजाब सौरभ, मासिक पत्रिका, भाषा विभाग, पंजाब, पटियाला, मई 1997, पृष्ठ-38-40
दोहे - कविता, डा० जगदीश व्योम, तुलसी प्रभा, मासिक पत्रिका, तुलसी भवन, विष्टपुर, जमशेदपुर-831001, दिसम्बर-2000, पृष्ठ-48
चुनियाँ के आँसू - बाल कहानी, डा० जगदीश व्योम, बाल वाटिका, नंद भवन, कावांखेड़ा पार्क, भीलवाड़ा, राजस्थान-311001, जनवरी-2002, पृष्ठ-30
तितली और गौरैया - बाल कविता, डा० जगदीश व्योम, बच्चों का देश, मासिक पत्रिका, 7 उषा कालोनी, मालवीय नगर, जयपुर-17, नवम्बर-2000, पृष्ठ-04
बाजीगर बन गई व्यवस्था - कविता, डा० जगदीश व्योम, आख्यायिनी, मासिक पत्रिका, जी-120, गली नं0 24, राजापुरी, उत्तम नगर, दिल्ली-110059, फरवरी-1999, पृष्ठ-96
लोकमानव का अभिव्यक्ति कौशल - लेख, डा० जगदीश व्योम, अक्षरालोक-7, लोक साहित्य एवं लोक संस्कृति विशेषांक, अभिव्यंजना, फर्रुखाबाद, 2011, पृष्ठ-92-95
लोमड़ी का पट्टा - बाल कहानी, डा० जगदीश व्योम, बालहंस, पाक्षिक पत्रिका, राजस्थान पत्रिका प्रकाशन, जयपुर, दिसम्बर (द्वितीय)-1996, पृष्ठ-48
गिलहरी - बाल कविता, डा० जगदीश व्योम, बालहंस, पाक्षिक पत्रिका, राजस्थान पत्रिका प्रकाशन, जयपुर, सितम्बर (प्रथम)-1997, पृष्ठ-40
हाथी और मेंढकी - बाल कहानी, डा० जगदीश व्योम, बालहंस, पाक्षिक पत्रिका, राजस्थान पत्रिका प्रकाशन, जयपुर, अप्रैल (द्वितीय)-1998, पृष्ठ-16
नन्हा बलिदानी - बाल उपन्यास(धारावाहिक), डा० जगदीश व्योम, बालहंस, पाक्षिक पत्रिका, राजस्थान पत्रिका प्रकाशन, जयपुर, सितम्बर (प्रथम)-1999, पृष्ठ-62
नन्हा बलिदानी - बाल उपन्यास(धारावाहिक), डा० जगदीश व्योम, बालहंस, पाक्षिक पत्रिका, राजस्थान पत्रिका प्रकाशन, जयपुर, सितम्बर (द्वितीय)-1999, पृष्ठ-52
गौरैया - बाल कविता, डा० जगदीश व्योम, बालहंस, पाक्षिक पत्रिका, राजस्थान पत्रिका प्रकाशन, जयपुर, अक्टूबर (प्रथम)-1998, पृष्ठ-41
बच्चे का मन - बाल कविता, डा० जगदीश व्योम, बालहंस, पाक्षिक पत्रिका, राजस्थान पत्रिका प्रकाशन, जयपुर, मार्च (द्वितीय)-1998, पृष्ठ-53
जाने क्यों उड़ जाता मोर - बाल कविता, डा० जगदीश व्योम, बालहंस, पाक्षिक पत्रिका, राजस्थान पत्रिका प्रकाशन, जयपुर, अक्टूबर (प्रथम)-1996, पृष्ठ-47
सगुनी का सपना - बाल कहानी, डा० जगदीश व्योम, बालहंस, पाक्षिक पत्रिका, राजस्थान पत्रिका प्रकाशन, जयपुर, जुलाई (प्रथम)-1998, पृष्ठ-78
लोकगाथाओं में सांस्कृतिक चेतना -लेख, डा० जगदीश व्योम, ब्रज की लोकगाथाएँ और कथागीत, सम्पादक- डा0 नरेश चन्द्र बंसल, प्रकाशक- ब्रजकला केन्द्र, मथुरा (उ0प्र0), प्रथम संस्करण-1998, पृष्ठ- 49-51
बाल पत्रकारिता: सवाल मान्यता और सरोकार का -लेख, डा० जगदीश व्योम, लोकतंत्र और पत्रकारिता, सम्पादक-डा० अमरसिंह वधान, प्रकाशक- भावना प्रकाशन, 126, पटपड़गंज, दिल्ली-110091, प्रथम संस्करण-2000, पृष्ठ- 99-109, ISBN .81.7667.036.7
हाइकु 1999 में हाइकु कविताएँ - डा० जगदीश व्योम, हाइकु-1999, सम्पादक- कमलेश भट्ट कमल, प्रकाशक- प्रारम्भ प्रकाशन, गाजियाबाद, प्रथम संस्करण-1999, पृष्ठ- 73-74, ISBN .81.86694.09.9
हाइकु 2009 फ्लैप पर - डा० जगदीश व्योम, हाइकु-2009, सम्पादक- कमलेश भट्ट कमल, प्रकाशक- प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली-110002, प्रथम संस्करण-2010, ISBN .81.7714.366.2
श्रीकृष्ण सरल द्वारा रचित महाकाव्य ‘चन्द्रशेखर आजाद’ वेबसाइट, डा० जगदीश व्योम द्वारा निर्मित का लोकार्पण म०प्र० सरकार के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह ने किया, - समाचार- दैनिक जागरण, इटारसी, 17 दिसम्बर 2005
कालिदास साहित्य अकादमी उज्जैन द्वारा आयोजित श्रीकृष्ण सरल का रचना संसार विषय पर 19 फरवरी 2006 को विशेष आलेख प्रस्तुति।
मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के पत्र संख्या 1735 दिनांक 23-02-2006 द्वारा ‘पं0 भवानी प्रसाद मिश्र होने का अर्थ’ विषय पर विशेष वक्तव्य हेतु आमंत्रित।
सम्मान व पुरस्कार-
शोध ग्रंथ ‘कन्नौजी लोकगाथाओं का सर्वेक्षण और विश्लेषण’ के लिए ‘प्रकाशिनी हिन्दी निधि’कन्नौज द्वारा सम्मानित।
‘नन्हा बलिदानी’ बाल उपन्यास के लिए-
श्री मधुर स्मृति बाल साहित्य पुरस्कार 1999, 24 नवम्बर-1999 को नागरी साहित्य संस्थान, बलिया द्वारा सम्मान
शंकुन्तला सिरोठिया बाल साहित्य पुरस्कार एवं
भारतीय बाल कल्याण संस्थान कानपुर
अनुभूति सम्मान
महाप्राण निराला सम्मान [डलमऊ]
इण्टरनेट पर कार्य इण्टरनेट पर 50 से अधिक बेवसाइट (जालघर) का हिन्दी के यूनिकोड फोंट में निर्माण जिसके लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर माइक्रोसाफ्ट भाषा इण्डिया पुरस्कार मिला।
http://desh-duniya.blogspot.in/2006/06/blog-post_26.html
हिन्दी की 100 सर्वश्रेष्ठ प्रेम कविताएँ ( हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध जालघर पर अतिथि संपादक) www.anubhuti-hindi.org
हाइकु दर्पण www.haikudarpan.blogspot.com
हाइकु कोश www.haikukosh.blogspot.com
नवगीत www.navgeet.blogspot.com
हिन्दी साहित्य www.hindisahitya.blogspot.com
बाल प्रतिबिम्ब www.balpratibimb.blogspot.com
व्योम के पार www.vyomkepar.blogspot.com
सम्प्रति-
उप शिक्षा निदेशक
शिक्षा निदेशालय
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली
सम्पर्क सूत्र-
डा० जगदीश व्योम
बी-12ए 58ए
धवलगिरि, सेक्टर-34
नोएडा-201301
e-mail- jagdishvyom@gmail.com
website-
www.jagdishvyom.blogspot.com
www.hindisahitya.blogspot.com
s
18 July 2010
कान में कहकर गया
उड़ गया मधुपान कर
कोई मधुप
और पहरों काँपता-सा
रह गया जलजात कोई !
सुर्ख चेहरे हो गए
जलकुंभियों के
कान में कहकर गया
कुछ बात कोई !!
डाकियों के का़फिले
फिर चल पड़े हैं
गंध-भीनी चिट्ठियाँ
लेकर परों में
गाँव के रिश्ते
सरोवर से जुड़स हैं
लग गई फिर पहुँचने
पुरइन घरों में
हो गया ऐसा असर
फिर जादुई है
कुछ दिनों से
सो न पाई रात कोई !
और पहरों काँपता-सा
रह गया जलजात कोई ......
बढ़ गई चिन्ता
सरोवर में बढ़ा जल
गात पुरइन ने बढ़ाया
जल सतह तक
घट गया जल
पर न घट सकता कमल-कद
अन्त तक जूझा हवा से
फिर फतह तक
है हमारे संस्कारों का पुरोधा
या सुरभि के सिन्धु का
नवजात कोई ।
और पहरों काँपता-सा
रह गया जलजात कोई ......
-डा० जगदीश व्योम
कोई मधुप
और पहरों काँपता-सा
रह गया जलजात कोई !
सुर्ख चेहरे हो गए
जलकुंभियों के
कान में कहकर गया
कुछ बात कोई !!
डाकियों के का़फिले
फिर चल पड़े हैं
गंध-भीनी चिट्ठियाँ
लेकर परों में
गाँव के रिश्ते
सरोवर से जुड़स हैं
लग गई फिर पहुँचने
पुरइन घरों में
हो गया ऐसा असर
फिर जादुई है
कुछ दिनों से
सो न पाई रात कोई !
और पहरों काँपता-सा
रह गया जलजात कोई ......
बढ़ गई चिन्ता
सरोवर में बढ़ा जल
गात पुरइन ने बढ़ाया
जल सतह तक
घट गया जल
पर न घट सकता कमल-कद
अन्त तक जूझा हवा से
फिर फतह तक
है हमारे संस्कारों का पुरोधा
या सुरभि के सिन्धु का
नवजात कोई ।
और पहरों काँपता-सा
रह गया जलजात कोई ......
-डा० जगदीश व्योम
09 July 2010
07 March 2010
02 January 2010
सौ-सौ बार बधाई
चढ़ती धूप
उतरता कुहरा
कोंपल अँखुआई
नए वर्ष में
नवगीतों की
फिर बगिया लहराई
मन कुरंग
भर रहा कुलाँचें
बहकी
गंध-भरी पुरवाई
ठिठुरन बढ़ी
दिशाएँ बाधित
चन्द्र-ग्रहण ने की अगुआई
फिर से आज बधाई !
सबको
सौ-सौ बार बधाई !!
सारस जोड़ी
लगीं उतरने
होने लगीं कुलेलें
विगत साल की
उलझी गुत्थीं
चोंच मिलाकर खोलें
मंत्र-मुग्ध हो गई किसानिन
सकुची, खड़ी, लजाई !
फिर से आज बधाई!
सबको
सौ-सौ बार बधाई !!
-डा० व्योम
एक अंश ये भी
उतरता कुहरा
कोंपल अँखुआई
नए वर्ष में
नवगीतों की
फिर बगिया लहराई
मन कुरंग
भर रहा कुलाँचें
बहकी
गंध-भरी पुरवाई
ठिठुरन बढ़ी
दिशाएँ बाधित
चन्द्र-ग्रहण ने की अगुआई
फिर से आज बधाई !
सबको
सौ-सौ बार बधाई !!
सारस जोड़ी
लगीं उतरने
होने लगीं कुलेलें
विगत साल की
उलझी गुत्थीं
चोंच मिलाकर खोलें
मंत्र-मुग्ध हो गई किसानिन
सकुची, खड़ी, लजाई !
फिर से आज बधाई!
सबको
सौ-सौ बार बधाई !!
-डा० व्योम
एक अंश ये भी
10 April 2008
02 March 2007
अभिनन्दन समारोह - 06-06-2007

डॉ॰ व्योम का सम्मान करते हुए विधायक श्री गिरिजा शंकर शर्मा, पुलिस अधीक्षक श्री वेदप्रकअश शर्मा

डॉ॰ व्योम को अभिनन्दन पत्र भेंट करते हुए डॉ॰ आर.पी.सीठा, श्री नीरज करैया, उपमहाप्रबंधक श्री राकेश कुमार,पुलिस अधीक्षक श्री वेदप्रकाश शर्मा, विधायक श्री गिरिजा शंकर शर्मा एवं केन्द्रीय विद्यालय के प्राचार्य श्री एस. के.उपाध्याय



31 January 2007
सूरज का टुकड़ा
वक्त के मछुआरे ने
फेंका था जाल
कैद करने के लिए
सघन तम को
जाल के छिद्रों से
फिसल गया तम
और
कैद हो गया
सूरज का टुकड़ा
वक्त का मछुआरा
कैद किए फिर रहा है
सूरज के उस टुकड़े को
और
सघनतम होती जा रही है
तमराशि, घट घट में
उगानी होगी
नई पौध
सूरज के नए टुकड़ों की
जागृत करनी होगी बोधगम्यता
युग शिक्षक के अन्तस में
तभी खिलेगी वनराशि
महकेगा वातास
छिटकेंगीं ज्ञान रश्मियाँ
मिट जाएँगीं
आप ही आप
आपस की दूरियाँ
तो, आओ !
अभी से .......
इस नए पथ की ओर
कहा भी गया है
जब आँख खुले
तभी होती है भोर !!
-डॉ॰ जगदीश व्योम
फेंका था जाल
कैद करने के लिए
सघन तम को
जाल के छिद्रों से
फिसल गया तम
और
कैद हो गया
सूरज का टुकड़ा
वक्त का मछुआरा
कैद किए फिर रहा है
सूरज के उस टुकड़े को
और
सघनतम होती जा रही है
तमराशि, घट घट में
उगानी होगी
नई पौध
सूरज के नए टुकड़ों की
जागृत करनी होगी बोधगम्यता
युग शिक्षक के अन्तस में
तभी खिलेगी वनराशि
महकेगा वातास
छिटकेंगीं ज्ञान रश्मियाँ
मिट जाएँगीं
आप ही आप
आपस की दूरियाँ
तो, आओ !
अभी से .......
इस नए पथ की ओर
कहा भी गया है
जब आँख खुले
तभी होती है भोर !!
-डॉ॰ जगदीश व्योम
21 October 2006
बाँध रोशनी की गठरी : नवगीत
सभी को दीपावली की शुभकामनाएँ !!
बाँध रोशनी की गठरी
फिर आई दीवाली।।
पूरी रात चले हम
लेकिन मंज़िल नहीं मिली
लौट-फेर आ गए वहीं
पगडंडी थी नकली
सफर गाँव का और
अंधेरे की चादर काली।
बाँध रोशनी की गठरी
फिर आई दीवाली।।
ताल ठोंक कर तम के दानव
कितने खड़े हुए
नन्हें दीप जुटाकर साहस
कब से अड़े हुए
हवा, समय का फेर समझकर
बजा रही ताली।
बाँध रोशनी की गठरी
फिर आई दीवाली।।
लक्ष्य हेतु जो चला कारवाँ
कितने भेद हुए
रामराज की बातें सुन-सुन
बाल सफेद हुए
ज्वार ज्योति का उठे
प्रतीक्षा दिग-दिगन्त वाली।
बाँध रोशनी की गठरी
फिर आई दीवाली।।
लड़ते-लड़ते दीप अगर
तम से, थक जाएगा
जुगुनू है तैयार, अँधेरे से
भिड़ जाएगा
विहँसा व्योम देख दीपक की
अद्भुत रख वाली।
बाँध रोशनी की गठरी
फिर आई दीवाली।।
-डॉ० जगदीश व्योम
बाँध रोशनी की गठरी
फिर आई दीवाली।।
पूरी रात चले हम
लेकिन मंज़िल नहीं मिली
लौट-फेर आ गए वहीं
पगडंडी थी नकली
सफर गाँव का और
अंधेरे की चादर काली।
बाँध रोशनी की गठरी
फिर आई दीवाली।।
ताल ठोंक कर तम के दानव
कितने खड़े हुए
नन्हें दीप जुटाकर साहस
कब से अड़े हुए
हवा, समय का फेर समझकर
बजा रही ताली।
बाँध रोशनी की गठरी
फिर आई दीवाली।।
लक्ष्य हेतु जो चला कारवाँ
कितने भेद हुए
रामराज की बातें सुन-सुन
बाल सफेद हुए
ज्वार ज्योति का उठे
प्रतीक्षा दिग-दिगन्त वाली।
बाँध रोशनी की गठरी
फिर आई दीवाली।।
लड़ते-लड़ते दीप अगर
तम से, थक जाएगा
जुगुनू है तैयार, अँधेरे से
भिड़ जाएगा
विहँसा व्योम देख दीपक की
अद्भुत रख वाली।
बाँध रोशनी की गठरी
फिर आई दीवाली।।
-डॉ० जगदीश व्योम
18 October 2006
दीवाली की रात।
हँसी फुलझड़ी सी महलों में दीवाली की रात
कुटिया रोयी सिसक सिसक कर दीवाली की रात।
कैसे कह दें बीत गया युग ये है बात पुरानी
मर्यादा की लुटी द्रोपदी दीवाली की रात।
घर के कुछ लोगों ने मिलकर खूब मनायीं खुशियाँ
शेष जनों से दूर बहुत थी दीवाली की रात।
जुआ खेलता रहा बैठकर वह घर के तलघर में
रहे सिसकते चूल्हा चक्की दीवाली की रात।
भोला बचपन भूल गया था क्रूर काल का दंशन
फिर फिर याद दिला जाती है दीवाली की रात।
तम के ठेकेदार जेब में सूरज को बैठाये
कैद हो गई चंद घरों में दीवाली की रात।
एक दिया माटी का पूरी ताकत से हुंकारा
जल कर जगमग कर देंगे हम दीवाली की रात।
***
डॉ॰ व्योम
कुटिया रोयी सिसक सिसक कर दीवाली की रात।
कैसे कह दें बीत गया युग ये है बात पुरानी
मर्यादा की लुटी द्रोपदी दीवाली की रात।
घर के कुछ लोगों ने मिलकर खूब मनायीं खुशियाँ
शेष जनों से दूर बहुत थी दीवाली की रात।
जुआ खेलता रहा बैठकर वह घर के तलघर में
रहे सिसकते चूल्हा चक्की दीवाली की रात।
भोला बचपन भूल गया था क्रूर काल का दंशन
फिर फिर याद दिला जाती है दीवाली की रात।
तम के ठेकेदार जेब में सूरज को बैठाये
कैद हो गई चंद घरों में दीवाली की रात।
एक दिया माटी का पूरी ताकत से हुंकारा
जल कर जगमग कर देंगे हम दीवाली की रात।
***
डॉ॰ व्योम
22 August 2006
छन्द [ रसखान की भाषा ]

माटी की सोंधी सुगंध सनी
मनमोहिनी है रसखान की भाषा ।
शब्द ढरे, निखरे, सुथरे भई
हीरकनी रसखान की भाषा ।
रीझी है कान्ह की कामरिया पै
बनी बँसुरी रसखान की भाषा ।
स्याम नचैं छछिया भरि छाछ पै
देखि हँसै रसखान की भाषा ।।
-डॉ॰ जगदीश व्योम
16 August 2006
छन्द

छन्द
मस्त मंजीरा खनकाय रही मीरा
और रस की गगरियाँ रसखान ढरकाबैं हैं
संग संग खेलैं खेल सूर ग्वाल-बालन के
दुहि पय धेनु को पतूखी मैं पिबावैं हैं
कूटि कूटि भरे लोकतत्व के सकोरा
गीत गाथन की धुनि जहाँ कान परि जाबै है
ऐसी ब्रज भूमि एक बेर देखिबे के काज
देवता के देवता को मनु ललचाबै है ।
-डॉ॰ जगदीश व्योम
14 May 2006
माँ
माँ कबीर की साखी जैसीतुलसी की चौपाई-सी
माँ मीरा की पदावली-सी
माँ है ललित स्र्बाई-सी।
माँ वेदों की मूल चेतना
माँ गीता की वाणी-सी
माँ त्रिपिटिक के सिद्ध सुक्त-सी
लोकोक्तर कल्याणी-सी।
माँ द्वारे की तुलसी जैसी
माँ बरगद की छाया-सी
माँ कविता की सहज वेदना
महाकाव्य की काया-सी।
माँ अषाढ़ की पहली वर्षा
सावन की पुरवाई-सी
माँ बसन्त की सुरभि सरीखी
बगिया की अमराई-सी।
माँ यमुना की स्याम लहर-सी
रेवा की गहराई-सी
माँ गंगा की निर्मल धारा
गोमुख की ऊँचाई-सी।
माँ ममता का मानसरोवर
हिमगिरि सा विश्वास है
माँ श्रृद्धा की आदि शक्ति-सी
कावा है कैलाश है।
माँ धरती की हरी दूब-सी
माँ केशर की क्यारी है
पूरी सृष्टि निछावर जिस पर
माँ की छवि ही न्यारी है।
माँ धरती के धैर्य सरीखी
माँ ममता की खान है
माँ की उपमा केवल है
माँ सचमुच भगवान है।
****
-डॉ० जगदीश व्योम
16 March 2006
इतने आरोप न थोपो
इतने आरोप न थोपो
मन बागी हो जाए
मन बागी हो जाए,
वैरागी हो जाए
इतने आरोप न थोपो.......
यदि बांच सको तो बांचो
मेरे अंतस की पीड़ा
जीवन हो गया तरंग रहित
बस पाषाणी क्रीडा
मन की अनुगूंज गूंज बन-बनकर
जब अकुलाती है
शब्दों की लहर लहर लहराकर
तपन बुझाती है
ये चिनगारी फिर से न मचलकर
आगी हो जाए
मन बागी हो जाए
इतने आरोप न थोपो..........
खुद खाते हो पर औरों पर
आरोप लगाते हो
सिक्कों में तुम ईमान-धरम के
संग बिक जाते हो
आरोपों की जीवन में जब-जब
हद हो जाती है
परिचय की गांठ पिघलकर
आंसू बन जाती है
नीरस जीवन मुंह मोड़ न अब
बैरागी हो जाए
मन बागी हो जाए
इतने आरोप न थोपो.........
आरोपों की विपरीत दिशा में
चलना मुझे सुहाता
सपने में भी है बिना रीढ़ का
मीत न मुझको भाता
आरोपों का विष पीकर ही तो
मीरा घर से निकली
लेखनी निराला की आरोपी
गरल पान कर मचली
ये दग्ध हृदय वेदनापथी का
सहभागी हो जाए
मन बागी हो जाए
इतने आरोप न थोपो .........
क्यों दिए पंख जब उड़ने पर
लगवानी थी पाबंदी
क्यों रूप वहां दे दिया जहां
बस्ती की बस्ती अंधी
जो तर्क बुद्धि से दूर बने रह
करते जीवन क्रीड़ा
वे क्या जाने सुकरातों की
कैसी होती है पीड़ा
जीवन्त बुद्धि वेदनापूत की
अनुरागी हो जाए
मन बागी हो जाए
इतने आरोप न थोपो.......
*****
-डॉ॰ जगदीश व्योम
मन बागी हो जाए
मन बागी हो जाए,
वैरागी हो जाए
इतने आरोप न थोपो.......
यदि बांच सको तो बांचो
मेरे अंतस की पीड़ा
जीवन हो गया तरंग रहित
बस पाषाणी क्रीडा
मन की अनुगूंज गूंज बन-बनकर
जब अकुलाती है
शब्दों की लहर लहर लहराकर
तपन बुझाती है
ये चिनगारी फिर से न मचलकर
आगी हो जाए
मन बागी हो जाए
इतने आरोप न थोपो..........
खुद खाते हो पर औरों पर
आरोप लगाते हो
सिक्कों में तुम ईमान-धरम के
संग बिक जाते हो
आरोपों की जीवन में जब-जब
हद हो जाती है
परिचय की गांठ पिघलकर
आंसू बन जाती है
नीरस जीवन मुंह मोड़ न अब
बैरागी हो जाए
मन बागी हो जाए
इतने आरोप न थोपो.........
आरोपों की विपरीत दिशा में
चलना मुझे सुहाता
सपने में भी है बिना रीढ़ का
मीत न मुझको भाता
आरोपों का विष पीकर ही तो
मीरा घर से निकली
लेखनी निराला की आरोपी
गरल पान कर मचली
ये दग्ध हृदय वेदनापथी का
सहभागी हो जाए
मन बागी हो जाए
इतने आरोप न थोपो .........
क्यों दिए पंख जब उड़ने पर
लगवानी थी पाबंदी
क्यों रूप वहां दे दिया जहां
बस्ती की बस्ती अंधी
जो तर्क बुद्धि से दूर बने रह
करते जीवन क्रीड़ा
वे क्या जाने सुकरातों की
कैसी होती है पीड़ा
जीवन्त बुद्धि वेदनापूत की
अनुरागी हो जाए
मन बागी हो जाए
इतने आरोप न थोपो.......
*****
-डॉ॰ जगदीश व्योम
सो गई है मनुजता की संवेदना
सो गई है मनुजता की संवेदना
गीत के रूप में भैरवी गाइए
गा न पाओ अगर जागरण के लिए
कारवां छोड़कर अपने घर जाइए
झूठ की चाशनी में पगी ज़िंदगी
आजकल स्वाद में कुछ खटाने लगी
सत्य सुनने की आदी नहीं है हवा
कह दिया इसलिए लड़खड़ाने लगी
सत्य ऐसा कहो, जो न हो निर्वसन
उसको शब्दों का परिधान पहनाइए।
काव्य की कुलवधू हाशिए पर खड़ी
ओढ़कर त्रासदी का मलिन आवरण
चन्द सिक्कों में बिकती रही ज़िंदगी
और नीलाम होते रहे आचरण
लेखनी छुप के आंसू बहाती रही
उनको रखने को गंगाजली चाहिए।
राजमहलों के कालीन की कोख में
कितनी रंभाओं का है कुंआरा स्र्दन
देह की हाट में भूख की त्रासदी
और भी कुछ है तो उम्र भर की घुटन
इस घुटन को उपेक्षा बहुत मिल चुकी
अब तो जीने का अधिकार दिलवाइए।
भूख के प'श्न हल कर रहा जो उसे
है जरूरत नहीं कोई कुछ ज्ञान दे
कर्म से हो विमुख व्यक्ति गीता रटे
और चाहे कि युग उसको सम्मान दे
ऐसे भूले पथिक को पतित पंक से
खींच कर कर्म के पंथ पर लाइए।
कोई भी तो नहीं दूध का है धुला
है प्रदूषित समूचा ही पर्यावरण
कोई नंगा खड़ा वक्त की हाट में
कोई ओढ़े हुए झूठ का आवरण
सभ्यता के नगर का है दस्तूर ये
इनमें ढल जाइए या चले आइए।
-डॉ॰ जगदीश व्योम
गीत के रूप में भैरवी गाइए
गा न पाओ अगर जागरण के लिए
कारवां छोड़कर अपने घर जाइए
झूठ की चाशनी में पगी ज़िंदगी
आजकल स्वाद में कुछ खटाने लगी
सत्य सुनने की आदी नहीं है हवा
कह दिया इसलिए लड़खड़ाने लगी
सत्य ऐसा कहो, जो न हो निर्वसन
उसको शब्दों का परिधान पहनाइए।
काव्य की कुलवधू हाशिए पर खड़ी
ओढ़कर त्रासदी का मलिन आवरण
चन्द सिक्कों में बिकती रही ज़िंदगी
और नीलाम होते रहे आचरण
लेखनी छुप के आंसू बहाती रही
उनको रखने को गंगाजली चाहिए।
राजमहलों के कालीन की कोख में
कितनी रंभाओं का है कुंआरा स्र्दन
देह की हाट में भूख की त्रासदी
और भी कुछ है तो उम्र भर की घुटन
इस घुटन को उपेक्षा बहुत मिल चुकी
अब तो जीने का अधिकार दिलवाइए।
भूख के प'श्न हल कर रहा जो उसे
है जरूरत नहीं कोई कुछ ज्ञान दे
कर्म से हो विमुख व्यक्ति गीता रटे
और चाहे कि युग उसको सम्मान दे
ऐसे भूले पथिक को पतित पंक से
खींच कर कर्म के पंथ पर लाइए।
कोई भी तो नहीं दूध का है धुला
है प्रदूषित समूचा ही पर्यावरण
कोई नंगा खड़ा वक्त की हाट में
कोई ओढ़े हुए झूठ का आवरण
सभ्यता के नगर का है दस्तूर ये
इनमें ढल जाइए या चले आइए।
-डॉ॰ जगदीश व्योम
अक्षर
अक्षर कभी क्षर नहीं होता
इसीलिए तो वह 'अक्षर' है
क्षर होता है तन
क्षर होता है मन
क्षर होता है धन
क्षर होता है अज्ञान
क्षर होता है
मान और सम्मान
परंतु नहीं होता है
कभी क्षर 'अक्षर'
इसलिए
अक्षरों को जानो
अक्षरों को पहचानो
अक्षरों को स्पर्श करो
अक्षरों को पढ़ो
अक्षरों को लिखो
अक्षरों की आरसी में
अपना चेहरा देखो
इन्हीं में छिपा है
तुम्हारा नाम
तुम्हारा ग्राम
और तुम्हारा काम
सृष्टि जब समाप्त हो जाएगी
तब भी रह जाएगा 'अक्षर'
क्यों कि 'अक्षर' तो ब्रह्म है
और भला
ब्रह्म भी कहीं मरता है?
आओ! बांचें
ब्रह्म के स्वरूप को
सीखकर अक्षर
-डॉ॰ जगदीश व्योम
इसीलिए तो वह 'अक्षर' है
क्षर होता है तन
क्षर होता है मन
क्षर होता है धन
क्षर होता है अज्ञान
क्षर होता है
मान और सम्मान
परंतु नहीं होता है
कभी क्षर 'अक्षर'
इसलिए
अक्षरों को जानो
अक्षरों को पहचानो
अक्षरों को स्पर्श करो
अक्षरों को पढ़ो
अक्षरों को लिखो
अक्षरों की आरसी में
अपना चेहरा देखो
इन्हीं में छिपा है
तुम्हारा नाम
तुम्हारा ग्राम
और तुम्हारा काम
सृष्टि जब समाप्त हो जाएगी
तब भी रह जाएगा 'अक्षर'
क्यों कि 'अक्षर' तो ब्रह्म है
और भला
ब्रह्म भी कहीं मरता है?
आओ! बांचें
ब्रह्म के स्वरूप को
सीखकर अक्षर
-डॉ॰ जगदीश व्योम
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